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Showing posts from May, 2026

सुकून

  हवा गरम थी, पर उसमें एक ठंडक छुपी हुई थी— वो ठंडक जो शायद सिर्फ मैंने महसूस की थी। लोग कह रहे थे, “बाहर लू चल रही है…” और मैं सोच रही थी, “शायद मेरे अंदर का शोर ही ज़्यादा था।” बाल उलझकर हवा में उड़ रहे थे, दुपट्टा बार-बार कंधों से फिसल रहा था, जैसे हवा मुझे रोककर कहना चाहती हो— “थोड़ी देर और रुक जाओ…” आस-पास कोई नहीं था। ना आवाज़ें, ना सवाल, ना किसी की मौजूदगी का बोझ। बस मैं थी, एक खाली कॉरिडोर था, और सन्नाटे में गूंजती पेड़ों के पत्तों की वो आवाज़ जो सीधे दिल तक उतर रही थी। तब समझ आया— मुझे हवा का गरम या ठंडा होना कभी मायने ही नहीं रखता था। मुझे तो बस वो जगह चाहिए थी जहाँ कुछ देर के लिए दुनिया ख़त्म हो जाए। एक अजीब-सी शांति थी उस पल में। ऐसी शांति जिसमें इंसान टूट भी सकता है और जुड़ भी सकता है। पता नहीं क्यों आँखों में आँसू आ गए थे। शायद इसलिए क्योंकि हम अक्सर तब रोते हैं जब दिल लड़ना छोड़ सिर्फ महसूस करना शुरू करता है। हवा चेहरे को छूकर जा रही थी, जैसे कह रही हो— “सब बाहर आने दो… जो इतने वक़्त से अंदर दबा रखा है।” और सच, उस वक़्त लग रहा था जैसे मेरे अंदर की सारी उलझन हवा के सा...